बेसुरा राग
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धूप तेज़ थी।
साइकिल पे था मैं, बैटरी खत्म पर थी, तेज़ी से कैफ़े पहुंचना था। थैले में चार्जर था, ठंडी हवा थी और मन में मुस्कुराहट।
कैफे की पार्किंग पे साइकिल लगाई। बुलबुलों की गूँज थी चारों ओर। देखा कि पड़ोसी भी ठीक उसी वक्त वहाँ पहुँचे। थोड़ा hi-hello हुआ और फिर कैफे के गेट की तरफ बढ़ने लगा।
बस कुछ कदम ही हुए होंगे कि वो उतरती हुई दिखी।
सर झुकाकर, टोपी पहने, कंधों पर वो झुकाव, ठीक वही तरीका चलने का, आँखें फ़ोन पर।
बड़े दिनों से उस दोस्त से मुलाकात नहीं हुई थी। इन चंद लम्हों में सोचकर खुश हो गया कि आज मिलने का मौका मिलेगा।
मैंने कहा — Heyyyyyyyyy
उसने तुरंत मुझे देखा,
और फिर वो हुआ,
उसकी आँखें मेरी आँखों पर पड़ीं। वो हैरान थी और मैं शर्मिंदा।
वो हवा जो मेरी तरफ चली थी, अब वापस नहीं आ सकती थी।
मैंने जो चिल्लाया था, वो अब वापस अपने सीने में नहीं ले सकता था।
मेरे दाहिने ओर गायें घास चर रही थीं, उन्होंने भी अपना सर उठाकर उस एक सेकंड में मुझे देखा।
उन्हें पता था की क्या हुआ है,
मेरे चेहरे की हँसी उसी समय बदली। मेरी आँखें बड़ी हो गईं।
उसकी आँखों में मेरी दोस्त नहीं थी। कोई पहचान नहीं थी, कोई याद नहीं थी, कोई वो चमक नहीं थी जो तब होती है जब कोई अपना अचानक मिल जाए।
बस एक अजनबी था जिसे किसी ने ज़ोर से बुला लिया था।
मैं वो अजनबी था ।
मैंने तुरंत दो बार सॉरी सॉरी कहा और फिर बोला, “I thought you were someone else।”
वो तेज़ी से आगे बढ़ गई, और मैं वहीं खड़ा रहा।
…और आज मैं वो एक्सीडेंटल hi हूँ जो बिना बताये मुँह से निकल जाती।
मैं वो गलत नंबर हूँ जो किसी और के फ़ोन पर बजती,
मैं वो जवाब हूँ जो सही सवाल पर नहीं आती,
और मैं वो राग हूँ जो बेसुरी महफ़िल में हमेशा बजती।

