अरे, इसको पता है
किताब बंद कर टेबल पे रखी।
“वे दिन” अब मेरे सीने से जुड़ा था। निर्मल वर्मा ने जिस ठहराव से यह उपन्यास लिखा था, मैं उसी ठहराव को ढूंढ रहा था। सोच रहा था कि जब उनकी कहानियाँ पढ़ता हूँ तो हमेशा भूल जाता हूँ कि कहानी है क्या। बस जो लम्हे वो सजाते हैं अपने शब्दों से, उन्हीं में पड़ा रहता हूँ।
तभी फ़ोन बजा। पता चला कि दोस्त मिलने आ रहे हैं, कुछ try करवाना है और वो बस घर पहुँच ही रहे हैं।
बिस्तर से उठा और उनके इंतज़ार में टेबल पर बैठ गया। अभी-अभी डिलीवरी हुई नई किताब को देखने लगा। बड़ी किताब है, मैंने सोचा, और फिर टेबल सँवारने लगा।
घंटी बजी और दोस्त अंदर आ गए। जूते भी नहीं उतारे।
अपने नए कैफे का मेनू सुना रहे थे। हर नाम में एक छोटी-सी कहानी छिपी थी, एक reference था, एक नयापन था, एक हँसी थी जो उनके बीच पहले से थी।
फिर उन्होंने एक नाम बताया।
Green Eggs, No Ham।
मेरी आँखें चमक उठीं। मुस्कुराकर कहा मैंने, यह तो बड़ा बढ़िया नाम है।
उन्होंने मुझे देखा और उनकी आँखों में अरे, इसको पता है साफ़ झलक रहा था।
मैं उस एक सेकंड में वो सब कुछ था जो मैं नहीं था।
Reference समझा हुआ।
जानकार।
कूल,
बहुत कूल।
मैंने उस भ्रम को तोड़ते हुए कहा, नहीं यार। बस नाम बड़ा अनोखा-सा लगा।
वो सेकंड जब उनकी आँखों से अरे निकलकर ओह बन गया,
वो मैं हूँ।
मैं वो accidental applause हूँ। वो गलत ताली हूँ जो सही जगह पड़ी, गलत वजह से।
मैं वो awkward pause हूँ जो तब आती है जब सब समझ जाते हैं कि तुमने नहीं समझा।

